एक परिधान निर्णयों की एक शृंखला के रूप में शुरू होता है। रूप, अनुपात, सामग्री, निर्माण, अभिव्यक्ति।

कुछ चीज़ें उनके सार तक घटा दी जाती हैं। कुछ को उनकी चरम सीमा तक ले जाया जाता है। न संयम अपने आप में लक्ष्य है, न अति।

यह नाम reductio ad absurdum से लिया गया है — तर्क की एक पद्धति, जो किसी प्रस्थापना को विरोधाभास तक ले जाकर परखती है।
हर धारणा पर सवाल उठाया जा सकता है। कुछ भी केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाता कि वह परिचित, अपेक्षित या स्थापित है।
कोई सिलाई ग़ायब हो सकती है क्योंकि उसका कोई प्रयोजन नहीं है। कोई ग्राफ़िक पूरे परिधान पर छा सकता है क्योंकि उसकी उपस्थिति ही मूल बात है।

कोई निर्धारित सौंदर्यशास्त्र नहीं है।




